कलयुग है ये भाई, यहां सबरी के बेरो सा बेर नहीं मिलता
May 3, 2015
तुम्हें सलाम करना भी आता था हमे लगा तुम्हे गिर जाने का डर है
वो हसीं आँखे, खुशनुमा चेहरा, जिसे मुझपर ऐतबार है
ऐ गुस्ताख , चाँद की झूठी चाँदनी पर ऐतबार न कर
दूर रहो हमसे मुझे राह चलते मुसाफिरों से बात करना पसंद नहीं.....उसने कहा और हमे मौहब्बत हो गई