एक साप्ताहिक रचना….
ये जो साप्ताहिक रविवार है ना
इससे तुम्हें बड़ा ही प्यार है नाकम्बख्त सोमवार गुस्ताख़ है
ये तुम्हारा भी गुनाहगार है नामंदिरों में सजावट खूब है आज
वो क्या है आज मंगलवार है नाहम एक काव्यगोष्ठी कर आये
अरे भाई आज बुद्धवार है नासोचा जरा नहाकर निकलूं मैं
शायद आज तो गुरुवार है नाथोड़ा सा हंस लिया हूँ आज मैं
दरअसल आज शुक्रवार है नाकल क्या होगा मुझे क्या पता
आखिर कल तो शनिवार है ना#गुनी…