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Dive into a collection of past posts and rediscover timeless content.
दरोगा जी — अंक – 1

दरोगा जी — अंक – 1

हर बार की तरह इस बार भी दरोगा जी अपने घर पर अपनी बीबी की डांट फटकार खाकर सब्जी खरीदने के लिए बाजार जा रहे थे मन ही मन बडबडा रहे थे कि सुबह होती है और ये मुझे सुनाने लगती है। उधर दरोगा जी की बीबी भी कुछ कम नहीं है वो भी घर में जोर जोर से चिल्ला कर दरोगा जी को गालियाँ देने में कमी नहीं छोड़ रही। इतने में एक आदमी बहार दौड़ता हुआ एक हिंदी समाचार पत्र बेचता हुआ जाता है।

Aug 9, 2014

प्यार का जाल

प्यार का जाल

गरीब हूँ बेसक मन में शक्ति हाथो में ढाल रखता हूँ

Aug 7, 2014

रूप तराशते

रूप तराशते

तुम फूलो से सजा देती हो मेरे आने वाले रास्ते

Aug 6, 2014

लिए खड़े हैं हम खुल

लिए खड़े हैं हम खुल

मित्र मेरे करीब के टोक देना हमको गर करें हम कोई भूल

Aug 6, 2014

अश्क-ए-नैना

अश्क-ए-नैना

अश्क-ए-नैना मेरे इतने फिजूल नहीं कि मैं ऐसे ही इन्हें बहने दूँ

Aug 4, 2014

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गुरमीत सिंह "गुनी"

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