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Dive into a collection of past posts and rediscover timeless content.
एक और ग़ालिब

एक और ग़ालिब

हमारे जख्म को नासूर बनाने वालो में एक और नाम शामिल हो गया

Aug 20, 2014

आँखों में समंदर

आँखों में समंदर

मैंने दूर तक नजर दौड़ाई, और मुझे एक समंदर नजर आया

Aug 20, 2014

पत्थरो में फसा हूँ या...

पत्थरो में फसा हूँ या...

एक लम्बा सफ़र तय किया, और न जाने कहाँ आ गया हूँ जहाँ न जमीं है न आसमां, न अपने हैं न पराये, न सुख है न गम, जहाँ देखता हूँ वहीँ पत्थर ही पत्थर नजर आते है खुद को इन पत्थरो के बीच फसा हुआ महसूस करता हूँ समझ नहीं आता क्या मैं पत्थरो में फसा हूँ या खुद पत्थर बन गया हूँ...!

Aug 19, 2014

पीछे नहीं देखती

पीछे नहीं देखती

वो कभी पीछे मुड़कर नहीं देखती कि कहीं मेरा गम उसकी आँखों से न छलक जाए ...!

Aug 19, 2014

न बम से, न बन्दुक से

न बम से, न बन्दुक से

आज मैं तेरे अंहकार को जगाना चाहता हूँ

Aug 19, 2014

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गुरमीत सिंह "गुनी"

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